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सामान्य रूप से संक्रमित रोगियों के अस्थि मज्जा को कोरोना आजीवन एंटीबॉडी सुरक्षा प्रदान करते हैं | कोरोनरी धमनी सामान्य रूप से संक्रमित रोगियों के अस्थि मज्जा को आजीवन एंटीबॉडी सुरक्षा प्रदान करती है।

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वाशिंगटन2 घंटे पहले

  • प्रतिरूप जोड़ना
  • वाशिंगटन विश्वविद्यालय, यूएसए में स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोध में दावा
  • 11 महीने बाद संक्रमित के अस्थि मज्जा में एंटीबॉडी भी मिलीं

आम तौर पर कोरोना से प्रभावित मरीजों को बीमारी से बाहर आने के बाद भी आजीवन एंटीबॉडी सुरक्षा मिलती है। ये लोग लगातार अपने शरीर में कोरोना वायरस के लिए एंटीबॉडी छोड़ते रहते हैं। अमेरिका की वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ मेडिसिन की रिसर्च में यह दावा किया गया है।

साइंस जर्नल नेचर में 24 मई को प्रकाशित शोध पत्र में कहा गया है कि सामान्य रूप से संक्रमित लोगों में कोरोना कभी न खत्म होने वाली एंटीबॉडी का कारण पाया गया है। ऐसे लोगों के भी कोरोना से संक्रमित होने की संभावना कम होती है। कुछ शोधों से पता चला है कि कोरोना संक्रमण के बाद एंटीबॉडी बहुत जल्दी खत्म हो जाती हैं। इतना ही नहीं इन लोगों में रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक समय तक नहीं रहती है।

हालांकि, नए शोध से जुड़े पैथोलॉजी और इम्यूनोलॉजी के एसोसिएट प्रो। एली अलीबेदी का कहना है कि कोरोना संक्रमण के बाद एंटीबॉडी का स्तर गिरना आम बात है, लेकिन यह दूर नहीं होता है। हमारे शोध में पाया गया है कि सामान्य लक्षणों से उबरने वाले कोरो रोगियों के अस्थि मज्जा में 11 महीने बाद भी एंटीबॉडी बनाने वाली कोशिकाएं पाई गई हैं। यह जीवन भर शरीर में रहता है और एंटीबॉडी बनाने में सक्षम है।

दुनिया भर के हालिया शोध के अनुसार, संक्रमण के दौरान एंटीबॉडी बनाने वाली कोशिकाएं तेजी से बढ़ती हैं। यह रक्त में तेजी से फैलता है और एंटीबॉडी को बहुत अधिक ऊंचाई तक ले जाता है। एक बार जब संक्रमण कम हो जाने के बाद अधिकांश कोशिकाएं मर जाती हैं, तो एंटीबॉडी का स्तर गिर जाता है। लेकिन एंटीबॉडी-उत्पादक कोशिकाएं, जिन्हें लंबे जीवन वाले प्लाज्मा कोशिकाओं के रूप में जाना जाता है, अस्थि मज्जा में कम मात्रा में व्यवस्थित होती हैं। वहां से यह एंटीबॉडी का उत्पादन और रिलीज करना जारी रखता है। यह पुन: संक्रमण के दौरान सुरक्षा प्रदान करता है।

कुल 77 कोरोना मरीजों पर नया शोध किया गया
यह शोध 77 कोरोना मरीजों पर किया गया, जिनमें सभी को सामान्य संक्रमण था। संक्रमण के एक महीने बाद तीन महीने के अंतराल पर उनके रक्त के नमूने लिए गए। बाद में हड्डियों को सात से आठ महीने के अंतराल पर लिया गया। जैसा कि इस नमूने की जांच में माना गया था, शुरुआती महीनों के बाद एंटीबॉडी तेजी से घटती दिखाई दीं। हालांकि, बाद में उनका स्तर बढ़ा और 11 महीने बाद उन्हें एंटीबॉडीज मिलीं। संक्रमण से बचे लोगों में कोई एंटीबॉडी नहीं पाई गई। अब टीम इस बात पर शोध कर रही है कि क्या एंटीबॉडीज रिलीज करके कोशिकाओं का निर्माण किया जाता है जो टीकाकरण के बाद लंबे समय तक चल सकती हैं।

अन्य प्रकार के कोरोनरी हृदय रोग के रोगियों पर भी शोध किया जाना चाहिए
यह शोध अच्छा है। कोरोना मरीजों के बोन मैरो की जांच से पता चला है कि उनमें संक्रमण के बाद लंबे समय तक एंटीबॉडीज रहती हैं। इस स्थिति में एंटीबॉडी 20 साल तक रह सकते हैं। यह संक्रमण होने पर ही एंटीबॉडी को बचाएगा। रक्त परीक्षण एंटीबॉडी के बारे में भी बता सकते हैं, लेकिन वे एंटीबॉडी लंबे समय तक शरीर में नहीं रहते हैं। अब अगले चरण में अन्य प्रकार के कोरोनरी हृदय रोग के रोगियों पर भी इसी तरह का शोध किया जाना चाहिए ताकि अधिक स्पष्टीकरण किया जा सके। > डॉ समर्थक। एकता गुप्ता, इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलीरी साइंसेज, नई दिल्ली

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Updated: June 1, 2021 — 12:29 am

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